Friday, January 17, 2014

ये ख़त कहलाया जाता है





एक मैं हूँ अब
की कोई याद नही करता
एक दिन था
जब हर कोई मुझ पर
था मरता
दूरियों को मिटाना
रोतों को हसाना
सब मुझ बिन कहाँ मुमकिन था
भोर होती तो डाकिया आता था
हर घर मैं मेला सा लग जाता था
कहीं किसी का आना
कहीं किसी का जाना था
सबको ये ख़बरें
मेरा काम पहुँचाना था
फौजी जो शरहद पर
और परिवार घर पर रोते थे
उनके आंसुओ से
मैं ही भिगोया जाता था
पर मेरी कोन यहाँ  
व्यथा है आज सुनने वाला
हाँ मालूम है
सबका वक़्त
एक दिन ढल जाना है
जामना नया है
और मेरा काम पुराना है  
तब मैं जो करता था
अब वो छुटकू कर जाता है
मैं दिन लगाता था
और वो पल लगाता है
और कहाँ कोई अब मेरे
झंझट में पड़ना चाहता है
पर अगर मैं जिन्दा हूँ
तो अहसास कहाँ मर जाता है
और अगर मैं मुर्दा हूँ
तो क्यूँ दफनाया नही जाता है
कोई कब्र तो होती
जो बच्चे देख कर पूछते.. क्या है ?
और जानते की हाँ  
ये ख़त कहलाया जाता है
मेरे लिए तो
दुविधा है
दुःख है
पर रो भी पाना
नामुमकिन है
मेरा तो आंसू भी
मेरी मौत बन जाता है

                                        संदीप सिंह रावत (पागल)

2 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना.

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    1. दिल से शुक्रिया राजू जी आपके तारीफ़ भरे लफ्जों का मोल मेरे लिए क्या है ये शायद आप नही जान पाएंगे ... :)

      आपने कहा था की प्रेम के आलावा भी बहुत कुछ है लिखने को तो सोचा कुछ और भी लिखना चाहिए ...

      धन्यवाद

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